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पतझड़ में भी फूल खिलाने निकला हूँ..

Posted On: 20 Jan, 2011 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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पतझड़ में भी फूल खिलाने निकला हूँ, अँधेरे में भी आज दीप जलाने निकला हूँ,
कभी चला में, कभी गिरा में. और कभी गिर -२ के उठ चला यारों,
चलते का तो साथ सभी देते है, में तो गिरते को भी आज उठाने निकला हूँ…
पतझड़ में भी फूल खिलाने निकला हूँ, अँधेरे में भी आज दीप जलाने निकला हूँ,
कभी जीत मिली, कभी हार मिली,  और कभी जीत जीत के भी हार मिली यारों,
जीत के पल तो हर कोई संजोता, मै तो हारों को भी आज सजाने निकला हूँ…
पतझड़ में भी फूल खिलाने निकला हूँ, अँधेरे में भी आज दीप जलाने निकला हूँ,
कभी मै डूबा, कभी मै तैरा, और कभी मै  डूब -डूब कर तैरा यारों,
धारा संग तो सभी है बहते, मै तो विपरीत धार में आज जीवन पार लगाने निकला हूँ..
पतझड़ में भी फूल खिलाने निकला हूँ, अँधेरे में भी दीप जलाने आज निकला हूँ,
कुछ दोस्त मिले, कुछ दोस्त बिछड़े , कुछ बिछड़ के वापस दोस्त मिले यारों,
दोस्त तो सभी बनाते है यारों, में तो कुछ दुश्मन दोस्त आज बनाने निकला हूँ …
पतझड़ में भी फूल खिलाने निकला हूँ, अँधेरे में भी दीप जलाने आज निकला हूँ,
कभी हंसा मै, कभी मै रोया, और कभी हंस-२ के भी रोया यारों,
खुशियों में सभी है हँसते यारों , में तो गम में भी आज मुस्कुराने निकला हूँ…
पतझड़ में भी फूल खिलाने निकला हूँ, अँधेरे में भी दीप जलाने आज निकला हूँ,

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 21, 2011

कुछ दोस्त मिले, कुछ दोस्त बिछड़े , कुछ बिछड़ के वापस दोस्त मिले यारों, दोस्त तो सभी बनाते है यारों, में तो कुछ दुश्मन दोस्त आज बनाने निकला हूँ … सुन्दर रचना के लिए बधाई निश जी|

    Nish aik bevkoof के द्वारा
    January 22, 2011

    आदरणीय वाहिद भाई, आपने रचना को सराहा और उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया दी बहुत बहुत धन्यवाद.

Amit Dehati के द्वारा
January 21, 2011

बहुत सुन्दर रचना !!!! वाकई अच्छा लगा …… http://amitdehati.jagranjunction.com

    Nish aik bevkoof के द्वारा
    January 22, 2011

    अमित भाई, अच्छा लगता है जब आप जैसे लोग तारीफ करते है , धन्यवाद !!


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